कोरोना काल के साईकिल द्वारा यात्रा आत्मनिर्भर मजबूरी

##आपदा_को_अवसर_बनाओ


बिहार की एक लड़की ज्योति, हजारों किलोमीटर दूर से सायकल पर अपने पिता को बिठाये हुए अपने घर पहुँचती है! वह बहादुर है! आत्मनिर्भर है! इसमें कोई शक नहीं है!

पूरी यात्रा के दौरान तंत्र सोया हुआ है! ज्योति की तरह लाखों लोग अलग अलग तरीकों से बचते बचाते अपने घर पहुंचे! बिना किसी मदद के!

यहाँ तंत्र का पेपर बहुत ही खराब चला गया है क्योंकि उसकी तमाम तैयारियों की पोल खुल गयी! भयंकर नेगेटिव मार्किंग हुई!

...और तंत्र को ये बात पता है! अब वह अपने अगले पेपर पर फोकस करता है ताकि नेगेटिव मार्किंग की इस खाई को पाटा जा सके! लेकिन यहाँ भी वह अंडबंड जवाब दे रहा है!

उसने ज्योति को साइकिल गिफ्ट में दे दी! महिमामण्डित कर रहे हैं कि....बेटी बहुत बहादुर है! हजारों किलोमीटर साइकिल चलाकर आयी है! देश का नाम रोशन कर दी है..ब्ला ब्ला!

आप ज्योति को वीरांगना कह लो! प्रतिभावान बता दो!"बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ" का ब्रांड अम्बेसडर घोषित कर दो! साइकिल की बजाय तुम उसके घर पर हेलीकॉप्टर बांध दो....

लेकिन उसके ठीक नीचे एक प्रश्न और है!


ज्योति की साइकिल यात्रा आत्मनिर्भर मजबूरी

-ज्योति को हजारों किलोमीटर साइकिल क्यों चलानी पड़ी? इसमें तंत्र के योगदान का उल्लेख करें!

बिहार की एक लड़की ज्योति, हजारों किलोमीटर दूर से सायकल पर अपने पिता को बिठाये हुए अपने घर पहुँचती है! वह बहादुर है! आत्मनिर्भर है! इसमें कोई शक नहीं है!

पूरी यात्रा के दौरान तंत्र सोया हुआ है! ज्योति की तरह लाखों लोग अलग अलग तरीकों से बचते बचाते अपने घर पहुंचे! बिना किसी मदद के!

यहाँ तंत्र का पेपर बहुत ही खराब चला गया है क्योंकि उसकी तमाम तैयारियों की पोल खुल गयी! भयंकर नेगेटिव मार्किंग हुई!

...और तंत्र को ये बात पता है! अब वह अपने अगले पेपर पर फोकस करता है ताकि नेगेटिव मार्किंग की इस खाई को पाटा जा सके! लेकिन यहाँ भी वह अंडबंड जवाब दे रहा है!

उसने ज्योति को साइकिल गिफ्ट में दे दी! महिमामण्डित कर रहे हैं कि....बेटी बहुत बहादुर है! हजारों किलोमीटर साइकिल चलाकर आयी है! देश का नाम रोशन कर दी है..ब्ला ब्ला!

आप ज्योति को वीरांगना कह लो! प्रतिभावान बता दो!"बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ" का ब्रांड अम्बेसडर घोषित कर दो! साइकिल की बजाय तुम उसके घर पर हेलीकॉप्टर बांध दो....

लेकिन उसके ठीक नीचे एक प्रश्न और है!

-ज्योति को हजारों किलोमीटर साइकिल क्यों चलानी पड़ी? इसमें तंत्र के योगदान का उल्लेख करें!

Kaala movie

काला.….

कल समय मिला तो 'काला ' फिल्म देखने का विचार आया
घोर आश्चर्य हुआ की एकाएक यह फिल्म सिर्फ एक हफ्ते में  दिल्ली के सिनेमाघरो से गायब कैसे हो गई? जबकि इस फ़िल्म की कमाई 100 करोड़ से अधिक है।

फिर इसके पटकथा का ध्यान आया जो मिडिया ने इसको रेटिंग दी है । मुख्य मिडिया के हिसाब से इसकी पटकथा दलित अस्मिता के हिसाब के लिखी गई है अतः रेटिंग 1.5 दी है।
Image@bahujantv

आप में से बहुतों ने फिल्म देख ली होगी , कहानी सबको पता ही होगी , रिव्यू या आलोचना पद्व ही ली होगी? किन्तु मैंने फिल्म अभी देखी है अतः इसपर लिखने से अपने आप को रोक नहीं पाया।

बहुत खोजने के बाद उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे लोनी बॉर्डर के पुराने और सिंगल पर्दे वाले सिनेमाघर में यह फिल्म लगी हुई मिली।

अब इस फिल्म की कहानी के पात्रों के नाम देखिये-

रजनीकांत का नाम काला है, काला रंग असुरों का होता है ऐसा ग्रँथ कहते हैं। फिल्म में काला शूद्र ही है। काला हमेशा काले कपड़े पहनता है।

काला के अधिकतर सीन में बैकग्राउंड में बुद्ध, अंबेडकर, लेनिन, मार्क्स की तस्वीरें दिखती है। बुद्ध विहार दिखता है।

नानापटेकर का नाम हरि अभ्यांकर है, हरि विष्णु का नाम है जो वैदिको के प्रमुख देवता है। हरि के आराध्य राम है, राम की मूर्ति उसके ऑफिस से लेके घर तक हर जगह  मिलती है।

हरि सफ़ेद कपडे पहनता है, काले रंग से उसे घृणा है। वह कहता है कि काला रंग गंदगी का होता है यंहा ध्यान देने की बात है कि ऋग्वेद में भी काले असुरों के प्रति घृणा है , उनके प्रति हिंसात्मक कार्यवाई है।

हरि की कंस्ट्रक्शन कंपनी का नाम 'मनु' है , मनु कौन थे और शूद्रो के प्रति क्या व्यवहार था यह सब जानते हैं।

काला के एक बेटे का नाम 'लेनिन' है, काला की प्रेमिका मुस्लिम है। काला ने एक देसी कुत्ता पाला हुआ है जिसका नाम भैरव होता है।

एक सीन पर लेनिन रोता है तो काला उसे डांटते हुए कहता है कि " रोता क्यों है? क्या इसी लिए मैंने तुझे एक क्रांतिकारी का नाम दिया था?"

हरि के बड़ा  नेता है, अपने पोस्टर पर लिखवाता है ' I am patriot , I will clean our country ' वह धारवी को 'डिजिटल ' बनाने का नारा देता है।

आप  मौजूदा एक बड़े नेता के कथन से इसे जोड़ के देखिये जो ' देशभक्त' होने का सर्टिफिकेट बांटता है, और 'स्वच्छ भारत ' नारा दे के चुनाव जीत गया है, वह ' डिजिटल भारत ' के नाम पर देश की अर्थव्यवस्था का क्या हाल कर दिया है यह आप जानते हैं।

काला के बेटे लेनिन की गर्लफ्रेंड जो की एक विरोधी और क्रांतिकारी प्रवृति की है , एक सीन में एक सेकेंड के लिए अपने छोटे से घर की लाइट जलाती है तो अम्बेडकर की तस्वीर दिखती है।

हरि अपने को राम समझता है और काला को रावण।

हरी  ' स्वच्छता अभियान ' की आड़ में अपनी ' मनु' कंपनी के जरिये धारवी जो की काला की बस्ती है, जंहा छोटी जाति /मुस्लिम आदि  गरीब लोग रहते है  जिन्होंने धारवी को अपनी मेहनत से खड़ा किया है, उस पर कब्ज़ा कर उसे तुड़वाके अमीरो के लिए बिल्डिंग्स और गोल्फ कोर्स बनवाना चाहता है।

वह धारवी के लोगो को उनकी जमीनों की एवज में छोटे छोटे कमरे देना चाहता है,काम धंधे के लिए अमीरो के घर नौकर बनने को कहता है।

धारवी प्रतीकात्मक रूप है भारत मूल लोगो की  जमीन का और मनु कंपनी प्रतीकात्मक रूप है उस पर कब्ज़ा करने वालो का और मूल लोगो को गुलाम बनाने का ।

काला एक सीन में अम्बेडकर का डायलॉग बोलता है' मैं अपने लोगो के अधिकारों के लिए स्वार्थी हूँ'

हरि पैर छूने की संस्कृति को उच्च मानता है जबकि काला हाथ मिलाने की। काला के अनुसार हाथ मिलाने से समानता की भावना आती है जबकि पैर छूने से दासता की।

हरि जब काला से हारने लगता है तो धारवी में 'हिन्दू मुस्लिम' दंगे करने की फ़िराक में रहता है, एक मस्जिद में सूअर का मॉस फिंकवा देता है। चुनाव जींतने के लिए हिन्दू मुस्लिम दंगे की ट्रिक किसकी है यह आप जानते हैं।

काला हरि के विरोध में धारवी के लोगो से अमीरों के घर काम बंद करने को कहता है ,और असहयोग आंदोलन चलवा देता है।

मिडिया उस आंदोलन की जम बुराई करती है यंहा तक की शान्ति पूर्ण आंदोलन को आतंकी आंदोलन बता देती है, यह सीन  मौजूदा मिडिया के रवैये को हूब हु दर्शाता है जो  दलितों के अधिकतर आंदोलन को आतंकी आंदोलन बता देती है। गोदी मिडिया जो काम करती है वैसी ही।

एक सीन बंद के दौरान लोगो को संबोधित करते हुए एक पुलिसवाला ' जय भीम'  के नारे लगा देता है।

काला एक डायलॉग बोलता है' अगर अपने अतीत की जड़े नहीं पहचानोगे तो भविष्य में खड़े कैसे रह पाओगे? "

हरि काला को मरवाने के लिए रामायण का पाठ अपने घर रखवाता है। काला मारा जाता है, किन्तु बस्ती के सभी लोग काला बन जाते हैं।

अंत में हरि के सफ़ेद कपड़ो पर पहले काला रंग गिरता है , फिर लाल और फिर नीला। ये तीनो रंग का अर्थ आप जानते हैं , काला दक्षिण का , लाल कम्युनिस्ट का और नीला अम्बेडकर का। हरि की सफ़ेद कमीज तीनो रंगों से सराबोर हो जाती है और वह मारा जाता है।

शूद्र/ दलित अस्मिता को लेके बनी ऐसी फिल्म मैंने आज तक बड़े पर्दे पर नहीं देखी , जंहा विरोध है शोषण के प्रति। जंहा खुल के बुद्ध है, अम्बेडकर हैं, लेनिन है, मार्क्स हैं ..... जय भीम है।

आश्चर्य है कि इस फिल्म पर बैन क्यों नहीं लगा अभी तक? शायद रजनीकांत और पा. रंजीथ फिल्म है इसलिए ऐसा नहीं हो पाया। किन्तु धूर्तता से इसे सिनेमाघरो से एक ही हफ्ते में उतार लिया गया।

सैल्यूट पा. रंजीथ , जो की स्वयं एक दलित है अतः ऐसी हिम्मत कर पाएं ।

फिल्म का हर दृश्य, बैकग्राउंड दृश्य, डायलॉग अपने आप में एक संदेश देता है, गूण रहस्य लिए हुए है, 'स्वच्छता अभियान' और 'डिजिटल इंडिया'' के नारे की आड़ में क्या होता है यह बखूबी दिखाया है।

यह फिल्म दो मुद्दों पर एक साथ प्रहार करती है, पहला ' स्वच्छ भारत' और ' डिजिटल इंडिया' की हकीकत तथा दूसरा भारत के मूल लोगो की जमीनों को कैसे हड़प के उन्हें गुलाम बनाया गया।

सभी कलाकरों के अभिनय जबरजस्त है, नानापटेकर ने  हरि अभ्यंकर के रोल में बहुत जानदार  ऐक्टिंग की है, रजनीकांत की तो खैर बात ही अलग है।

आप इस फिल्म को देखिये जरूर...मेरी तरफ से रेटिंग 4.5

साभार — संजय जी , Go Atheist व्हाट्सएप ग्रुप से 

वाह भाई वाह...... एक भीमपुत्र कवि की रचना

वाह भाई वाह
काबिले तारीफ हैं
 हम ओर हमारी
अपनी बेशर्मी  ओर कृतघ्नता
अपने आरक्षण के बलिदानियों के प्रति
बस मौज भाई मौज
ओर भी मौज
अरे आंख बंद कर भी  मौज
अनजान ही रहना है
चाहे
कितनी भी करते जाए
सोरी
करते नही  रचते जाए
भीम के बंदों के अपमान
नही शर्मिन्दगी की जुठी मुठी कहानी
पर भीम के कृतघ्न हम मौज ही मौज
बस जय जय जय पुण्य पाप की
सेवा और समाज की
बस चुपचाप देखकर
सोचना
कोई सवाल मत करना
बाकी सब आपकी सोच और संस्कार
की व्यवहारिक होगी कहानी
कितने लापरवाह-------------?

Sc/st act मेंं बदलाव के विरोध मेंं आबूरोड़ बंद सफल

SC ST ऐप्स के बदलाव में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के विरोध में आबूरोड सफल बंद रहा ।




आबू रोड को बंद करवाने में भीम सैनिकों ने बढ़-चढ़कर चढ़कर भाग लिया 1 अप्रैल शाम को बाइक रेली निकालकर भारत बंद में समर्थन मांगा 2 अप्रैल सुबह 6:00 बजे से आंबेडकर चौक मानपुर में भीम सैनिक एकत्रित होकर रैली प्रारंभ की जो साईं बाबा मंदिर होते हुए मैन बाजार , सदर मार्केट से सातपुर तक फिर सातपुर से डाक बंगले तक रैली निकाली तथा डाक बंगले में SDM को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन दिया । रैली में करीबन 2500 से ज्यादा भीम सैनिकों ने भाग लिया सबके हाथों में नीले झंडे माथे पर नीला तिलक सिर पर जय भीम, संविधान विरोधी बात छोड़ो नारे वाली टोपी लगाकर "जब जब जुल्मी जुल्म करेगा सत्ता के हथियारों से चप्पा चप्पा गूंज उठेगा जय भीम के नारों से" बोलते हुए पूरे जोश में रैली निकाली । रैली में अंबेडकर सेवा समिति के अध्यक्ष राजेंद्र परमार , तोला राम मेघवाल ,गणपत मेघवाल, प्राचार्य आशुतोष मीणा, लालाराम गरासिया , गंगाबेन गरासिया , तथा भीम आर्मी के अध्यक्ष खेमराज परिहार , प्रेम मिरल , भूपेंद्र कुमार , धारू राम बोस, गजेंद्र मेघवाल, मनीष गहलोत, नकुल मेहरा ,संग्राम राणा ,गणपत लाल अहम्पा ,जामता राम केम्पाल ,सुरेश कोली ,नेनाराम अहम्पा इत्यादि सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे। 

बाबा साहेब डॉक्टर बी आर अंबेडकर जीवनी


विश्व रत्न बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर

भीमरावरामजीआंबेडकर का जन्म मध्य प्रदेश के सैन्य छावनी मऊ में हुआ था।  वे रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई की 14 वीं व अंतिम संतान थे।  उनका परिवार मराठी था और वो अंबावडे नगर जो आधुनिक महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले मे है, से संबंधित था। वे हिंदू महार जाति से संबंध रखते थे, जो अछूत कहे जाते थे और उनके साथ सामाजिक और आर्थिक रूप से गहरा भेदभाव किया जाता था। अम्बेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत थे और उनके पिता, भारतीय सेना की मऊ छावनी में सेवा मे सूबेदार के पद पर थे। उन्होंने मराठी और अंग्रेजी में औपचारिक शिक्षा की डिग्री प्राप्त की थी। उन्होने अपने बच्चों को स्कूल में पढने और कड़ी मेहनत करने के लिये हमेशा प्रोत्साहित किया । कबीरपंथ से संबंधित इस परिवार में, रामजी सकपाल, अपने बच्चों को हिंदू ग्रंथों को पढ़ने के लिए, विशेष रूप से महाभारत और रामायण प्रोत्साहित किया करते थे। उन्होने सेना मे अपनी हैसियत का उपयोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से शिक्षा दिलाने मे किया, क्योंकि अपनी जाति के कारण उन्हें इसके लिये सामाजिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा था। स्कूली पढ़ाई में सक्षम होने के बावजूद आंबेडकर और अन्य अस्पृश्य बच्चों को विद्यालय मे अलग बिठाया जाता था और अध्यापकों द्वारा न तो ध्यान ही दिया जाता था, न ही कोई सहायता दी जाती थी। उनको कक्षा के अन्दर बैठने की अनुमति नहीं थी, साथ ही प्यास लगने प‍र कोई ऊँची जाति का व्यक्ति ऊँचाई से पानी उनके हाथों पर पानी डालता था, क्योंकि उनको न तो पानी, न ही पानी के पात्र को स्पर्श करने की अनुमति थी। मनुवादियों की धारणा यह थी की ऐसा करने से पात्र और पानी दोनों अपवित्र हो जाते थे। आमतौर पर यह काम स्कूल के चपरासी द्वारा किया जाता था जिसकी अनुपस्थिति में बालक आंबेडकर को बिना पानी के ही रहना पड़ता था। 1894 मे रामजी सकपाल सेवानिवृत्त हो जाने के बाद सपरिवार सतारा चले गए और इसके दो साल बाद, अम्बेडकर की मां की मृत्यु हो गई। बच्चों की देखभाल उनकी चाची ने कठिन परिस्थितियों में की। रामजी सकपाल के केवल तीन बेटे, बलराम, आनंदराव और भीमराव और दो बेटियाँ मंजुला और तुलासा ही इन कठिन हालातों मे जीवित बच पाये। अपने भाइयों और बहनों मे केवल अम्बेडकर ही स्कूल की परीक्षा में सफल हुए और इसके बाद बड़े स्कूल मे जाने में सफल हुये। अपने एक देशस्त ब्राह्मण शिक्षक महादेव अम्बेडकर जो उनसे विशेष स्नेह रखते थे उनके कहने पर अम्बेडकर ने अपने नाम से सकपाल हटाकर अम्बेडकर जोड़ लिया जो उनके गांव के नाम “अंबावडे” पर आधारित था । रामजीसकपाल ने 1898 मे पुनर्विवाह कर लिया और परिवार के साथ मुंबई चले आये। यहाँ अम्बेडकर एल्फिंस्टोन रोड पर स्थित गवर्न्मेंट हाई स्कूल के पहले अछूत छात्र बने। पढा़ई में अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन के बावजूद, अम्बेडकर लगातार अपने विरुद्ध हो रहे इस अलगाव और, भेदभाव से व्यथित रहे। 1907 में मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद अम्बेडकर ने बंबई विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और इस तरह वो भारत में कॉलेज में प्रवेश लेने वाले पहले अस्पृश्य बन गये। उनकी इस सफलता से उनके पूरे समाज मे एक खुशी की लहर दौड़ गयी और बाद में एक सार्वजनिक समारोह उनका सम्मान किया गया इसी समारोह में उनके एक शिक्षक कृषणजी अर्जुन केलूसकर ने उन्हें महात्मा बुद्ध की जीवनी भेंट की, श्री केलूसकर, एक मराठा जाति के विद्वान थे। अम्बेडकर की सगाई एक साल पहले हिंदू रीति के अनुसार दापोली की, एक नौ वर्षीय लड़की, रमाबाई से तय की गयी थी।  1908 में, उन्होंने एलिफिंस्टोन कॉलेज में प्रवेश लिया और बड़ौदा के गायकवाड़ शासक सहयाजी राव तृतीय से संयुक्त राज्य अमेरिका मे उच्च अध्धयन के लिये एक पच्चीस रुपये प्रति माह छात्रवृत्ति प्राप्त की ।1912 में उन्होंने राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में अपनी डिग्री प्राप्त की और बड़ौदा राज्य सरकार की नौकरी को तैयार हो गये। उनकी पत्नी ने अपने पहले बेटे यशवंत को इसी वर्ष जन्म दिया। अम्बेडकर अपने परिवार के साथ बड़ौदा चले आये पर जल्द ही उन्हें अपने पिता की बीमारी के चलते बंबई वापस लौटना पडा़, जिनकी मृत्यु 2 फरवरी 1913 को हो गयी।
शिक्षा
1922 में एक वकील के रूप में अम्बेडकर
गायकवाड शासक ने संयुक्त राज्य अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय मे जाकर अध्ययन के लिये अम्बेडकर का चयन किया गया साथ ही इसके लिये एक 11.5 डॉलर प्रति मास की छात्रवृत्ति भी प्रदान की। न्यूयॉर्क शहर में आने के बाद, अम्बेडकर को राजनीति विज्ञान विभाग के स्नातक अध्ययन कार्यक्रम में प्रवेश दे दिया गया। शयनशाला मे कुछ दिन रहने के बाद, वे भारतीय छात्रों द्वारा चलाये जा रहे एक आवास क्लब मे रहने चले गए और उन्होने अपने एक पारसी मित्र नवल भातेना के साथ एक कमरा ले लिया। 1916 में, उन्हे उनके एक शोध के लिए P.hd से सम्मानित किया गया। इस शोध को अंततः उन्होंने पुस्तक “इवोल्युशन ओफ प्रोविन्शिअल फिनान्स इन ब्रिटिश इंडिया” के रूप में प्रकाशित किया। हालाँकि उनकी पहला प्रकाशित काम, एक लेख जिसका शीर्षक, भारत में जाति : उनकी प्रणाली, उत्पत्ति और विकास है। अपनी डाक्टरेट की डिग्री लेकर अम्बेडकर लंदन चले गये जहाँ उन्होने ग्रे’स इन और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में कानून का अध्ययन और अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट शोध की तैयारी के लिये अपना नाम लिखवा लिया। अगले वर्ष छात्रवृत्ति की समाप्ति के चलते मजबूरन उन्हें अपना अध्ययन अस्थायी तौर बीच मे ही छोड़ कर भारत वापस लौटना पडा़ ये विश्व युद्ध प्रथम का काल था। बड़ौदा राज्य के सेना सचिव के रूप में काम करते हुये अपने जीवन मे अचानक फिर से आये भेदभाव से अम्बेडकर उदास हो गये और अपनी नौकरी छोड़ एक निजी ट्यूटर और लेखाकार के रूप में काम करने लगे। यहाँ तक कि अपनी परामर्श व्यवसाय भी आरंभ किया जो उनकी सामाजिक स्थिति के कारण विफल रहा। अपने एक अंग्रेज जानकार बंबई के पूर्व राज्यपाल लॉर्ड सिडनेम, के कारण उन्हें बंबई के सिडनेम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनोमिक्स मे राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर के रूप में नौकरी मिल गयी। 1920 में कोल्हापुर के महाराजा अपने पारसी मित्र के सहयोग और अपनी बचत के कारण वो एक बार फिर से इंग्लैंड वापस जाने में सक्षम हो गये। 1923 में उन्होंने अपना शोध प्रोब्लेम्स ऑफ द रुपी (रुपये की समस्यायें) पूरा कर लिया। उन्हें लंदन विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ साईंस की उपाधि प्रदान की गयी। और उनकी कानून का अध्ययन पूरा होने के, साथ ही साथ उन्हें ब्रिटिश बार मे बैरिस्टर के रूप में प्रवेश मिल गया। भारत वापस लौटते हुये अम्बेडकर तीन महीने जर्मनी में रुके, जहाँ उन्होने अपना अर्थशास्त्र का अध्ययन, बॉन विश्वविद्यालय में जारी रखा। उन्हे औपचारिक रूप से ८ जून 1927 को कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा पी . एच. डी. प्रदान की गयी ।
छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष
भारत_सरकार_अधिनियम 1919, तैयार कर रही साउथबोरोह समिति के समक्ष, भारत के एक प्रमुख विद्वान के तौर पर अम्बेडकर को गवाही देने के लिये आमंत्रित किया गया। इस सुनवाई के दौरान, अम्बेडकर ने दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लिये पृथक निर्वाचिका (separate electorates) और आरक्षण देने की वकालत की। 1920 में, बंबई में, उन्होंने साप्ताहिक मूकनायक के प्रकाशन की शुरूआत की। यह प्रकाशन जल्द ही पाठकों मे लोकप्रिय हो गया, तब अम्बेडकर ने इसका इस्तेमाल रूढ़िवादी हिंदू राजनेताओं व जातीय भेदभाव से लड़ने के प्रति भारतीय राजनैतिक समुदाय की अनिच्छा की आलोचना करने के लिये किया। उनके दलित वर्ग के एक सम्मेलन के दौरान दिये गये भाषण ने कोल्हापुर राज्य के स्थानीय शासक शाहू चतुर्थ को बहुत प्रभावित किया, जिनका अम्बेडकर के साथ भोजन करना रूढ़िवादी समाज मे हलचल मचा गया। अम्बेडकर ने अपनी वकालत अच्छी तरह जमा ली और बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना भी की जिसका उद्देश्य दलित वर्गों में शिक्षा का प्रसार और उनके सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिये काम करना था। सन् 1926 में, वो बंबई विधान परिषद के एक मनोनीत सदस्य बन गये। सन 1927 में डॉ॰ अम्बेडकर ने छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। उन्होंने सार्वजनिक आंदोलनों और जुलूसों के द्वारा, पेयजल के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी लोगों के लिये खुलवाने के साथ ही उन्होनें अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिये भी संघर्ष किया। उन्होंने महड में अस्पृश्य समुदाय को भी शहर की पानी की मुख्य टंकी से पानी लेने का अधिकार दिलाने कि लिये सत्याग्रह चलाया।
1 जनवरी 1927 को डॉ. अम्बेडकर ने द्वितीय आंग्ल – मराठा युद्ध, की कोरेगाँव की लडा़ई के दौरान मारे गये भारतीय सैनिकों के सम्मान में कोरेगाँव विजय स्मारक मे एक समारोह आयोजित किया। यहाँ महार समुदाय से संबंधित सैनिकों के नाम संगमरमर के एक शिलालेख पर खुदवाये। 1927 में, उन्होंने अपना दूसरी पत्रिका बहिष्कृत भारत शुरू की और उसके बाद रीक्रिश्टेन्ड जनता की। उन्हें बाँबे प्रेसीडेंसी समिति मे सभी यूरोपीय सदस्यों वाले साइमन आयोग 1928 में काम करने के लिए नियुक्त किया गया। इस आयोग के विरोध मे भारत भर में विरोध प्रदर्शन हुये और जबकि इसकी रिपोर्ट को ज्यादातर भारतीयों द्वारा नजरअंदाज कर दिया गया, डॉ अम्बेडकर ने अलग से भविष्य के संवैधानिक सुधारों के लिये सिफारिशों लिखीं।
पूना (पैक्ट)संधि
दूसरा गोलमेज सम्मेलन अब तक डॉ अम्बेडकर आज तक की सबसे बडी़ अछूत राजनीतिक हस्ती बन चुके थे। उन्होंने मुख्यधारा के महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों की जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति उनकी कथित उदासीनता की कटु आलोचना की। अम्बेडकर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके नेता मोहनदास गांधी की आलोचना की, उन्होने उन पर अस्पृश्य समुदाय को एक करुणा की वस्तु के रूप मे प्रस्तुत करने का आरोप लगाया। अम्बेडकर ब्रिटिश शासन की विफलताओं से भी असंतुष्ट थे, उन्होने अस्पृश्य समुदाय के लिये एक ऐसी अलग राजनैतिक पहचान की वकालत की जिसमे कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों का ही कोई दखल ना हो। 8 अगस्त, 1930 को एक शोषित वर्ग के सम्मेलन के दौरान अम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक दृष्टि को दुनिया के सामने रखा, जिसके अनुसार शोषित वर्ग की सुरक्षा उसके सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतंत्र होने मे है।
राजनीतिक काम ने उसको रूढ़िवादी हिंदुओं के साथ ही कांग्रेस के कई नेताओं मे भी बहुत अलोकप्रिय बना दिया, यह वही नेता थे जो पहले छुआछूत की निंदा करते थे और इसके उन्मूलन के लिये जिन्होने देश भर में काम किया था। इसका मुख्य कारण था कि ये “उदार” राजनेता आमतौर पर अछूतों को पूर्ण समानता देने का मुद्दा पूरी तरह नहीं उठाते थे। अम्बेडकर की अस्पृश्य समुदाय मे बढ़ती लोकप्रियता और जन समर्थन के चलते उनको 1931 मे लंदन में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में, भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। यहाँ उनकी अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने के मुद्दे पर तीखी बहस हुई। धर्म और जाति के आधार पर पृथक निर्वाचिका देने के प्रबल विरोधी गांधी ने आशंका जताई, कि अछूतों को दी गयी पृथक निर्वाचिका, हिंदू समाज की भावी पीढी़ को हमेशा के लिये विभाजित कर देगी।
1932 मे जब ब्रिटिशों ने अम्बेडकर के साथ सहमति व्यक्त करते हुये अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने की घोषणा की,  तब गांधी ने इसके विरोध मे पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में आमरण अनशन शुरु कर दिया। गाँधी ने रूढ़िवादी हिंदू समाज से सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता को खत्म करने तथा, हिंदुओं की राजनीतिक और सामाजिक एकता की बात की। गांधी के अनशन को देश भर की जनता से घोर समर्थन मिला और रूढ़िवादी हिंदू नेताओं, कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं जैसे पवलंकर बालू और मदन मोहन मालवीय ने अम्बेडकर और उनके समर्थकों के साथ यरवदा मे संयुक्त बैठकें कीं। अनशन के कारण गांधी की मृत्यु होने की स्थिति मे, होने वाले सामाजिक प्रतिशोध के कारण होने वाली अछूतों की हत्याओं के डर से और गाँधी जी के समर्थकों के भारी दवाब के चलते अंबेडकर ने अपनी पृथक निर्वाचिका की माँग वापस ले ली। इसके एवज मे अछूतों को सीटों के आरक्षण, मंदिरों में प्रवेश/पूजा के अधिकार एवं छूआ-छूत ख़तम करने की बात स्वीकार कर ली गयी। गाँधी ने इस उम्मीद पर की बाकि सभी स्वर्ण भी  पूना_संधि का आदर कर, सभी शर्ते मान लेंगे अपना अनशन समाप्त कर दिया ।
आरक्षण प्रणाली में पहले दलित अपने लिए संभावित उमीदवारों में से चुनाव द्वारा (केवल दलित) चार संभावित उमीदवार चुनते। इन चार उम्मीदवारों में से फिर संयुक्त निर्वाचन चुनाव (सभी धर्म \ जाति) द्वारा एक नेता चुना जाता। इस आधार पर सिर्फ एक बार सन 1937 में चुनाव हुए। आंबेडकर 20-25 साल के लिये आरक्षण चाहते थे लेकिन गाँधी के अड़े रहने के कारण यह आरक्षण मात्र 5 साल के लिए ही लागू हुआ ।
पृथक निर्वाचिका में दलित दो वोट देता एक सामान्य वर्ग के उम्मीदवार को ओर दूसरा दलित (पृथक) उम्मीदवार को। ऐसी स्थिति में दलितों द्वारा चुना गया दलित उम्मीदवार दलितों की समस्या को अच्छी तरह से तो रख सकता था किन्तु गैर उम्मीदवार के लिए यह जरूरी नहीं था कि उनकी समस्याओं के समाधान का प्रयास भी करता। बाद मे अम्बेडकर ने गाँधी जी की आलोचना करते हुये उनके इस अनशन को अछूतों को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित करने और उन्हें उनकी माँग से पीछे हटने के लिये दवाब डालने के लिये गांधी द्वारा खेला गया एक नाटक करार दिया। उनके अनुसार असली महात्मा तो ज्योति राव फुले थे ।
राजनीतिक_जीवन
अक्टूबर 1935, को येओला नासिक मे अम्बेडकर एक रैली को संबोधित करते हुए  13 अक्टूबर 1935 को, अम्बेडकर को सरकारी लॉ कॉलेज का प्रधानचार्य नियुक्त किया गया और इस पद पर उन्होने दो वर्ष तक कार्य किया। इसके चलते अंबेडकर बंबई में बस गये, उन्होने यहाँ एक बडे़ घर का निर्माण कराया, जिसमे उनके निजी पुस्तकालय मे 50000 से अधिक पुस्तकें थीं।  इसी वर्ष उनकी पत्नी रमाबाई की एक लंबी बीमारी के बाद मृत्यु हो गई। रमाबाई अपनी मृत्यु से पहले तीर्थयात्रा के लिये पंढरपुर जाना चाहती थीं पर अंबेडकर ने उन्हे इसकी इजाज़त नहीं दी। अम्बेडकर ने कहा की उस हिन्दु तीर्थ मे जहाँ उनको अछूत माना जाता है, जाने का कोई औचित्य नहीं है इसके बजाय उन्होने उनके लिये एक नया पंढरपुर बनाने की बात कही। भले ही अस्पृश्यता के खिलाफ उनकी लडा़ई को भारत भर से समर्थन हासिल हो रहा था पर उन्होने अपना रवैया और अपने विचारों को रूढ़िवादी हिंदुओं के प्रति और कठोर कर लिया। उनकी रूढ़िवादी हिंदुओं की आलोचना का उत्तर बडी़ संख्या मे हिंदू कार्यकर्ताओं द्वारा की गयी उनकी आलोचना से मिला। 13 अक्टूबर को नासिक के निकट येओला मे एक सम्मेलन में बोलते हुए अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन करने की अपनी इच्छा प्रकट की। उन्होने अपने अनुयायियों से भी हिंदू धर्म छोड़ कोई और धर्म अपनाने का आह्वान किया ।  उन्होने अपनी इस बात को भारत भर मे कई सार्वजनिक सभाओं मे दोहराया भी।
1936 में, अम्बेडकर ने स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की, जो 1937 में केन्द्रीय विधान सभा चुनावों मे 15 सीटें जीती। उन्होंने अपनी पुस्तक जाति के विनाश भी इसी वर्ष प्रकाशित की जो उनके न्यूयॉर्क मे लिखे एक शोधपत्र पर आधारित थी। इस सफल और लोकप्रिय पुस्तक मे अम्बेडकर ने हिंदू धार्मिक नेताओं और जाति व्यवस्था की जोरदार आलोचना की। उन्होंने अस्पृश्य समुदाय के लोगों को गाँधी द्वारा रचित शब्द हरिजन पुकारने के कांग्रेस के फैसले की कडी़ निंदा की। अम्बेडकर ने रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद के लिए श्रम मंत्री के रूप में सेवारत रहे।
1941 और 1945 के बीच में उन्होंने बड़ी संख्या में अत्यधिक विवादास्पद पुस्तकें और पर्चे प्रकाशित किये जिनमे ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ भी शामिल है, जिसमें उन्होने मुस्लिम लीग की मुसलमानों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान की मांग की आलोचना की। वॉट काँग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स (काँग्रेस और गान्धी ने अछूतों के लिये क्या किया) के साथ, अम्बेडकर ने गांधी और कांग्रेस दोनो पर अपने हमलों को तीखा कर दिया उन्होने उन पर ढोंग करने का आरोप लगाया। उन्होने अपनी पुस्तक ‘हू वर द शुद्राज़?’( शुद्र कौन थे?) के द्वारा हिंदू जाति व्यवस्था के पदानुक्रम में सबसे नीची जाति यानी शुद्रों के अस्तित्व मे आने की व्याख्या की. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि किस तरह से अछूत, शुद्रों से अलग हैं। अम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक पार्टी को अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन मे बदलते देखा, हालांकि 1946 में आयोजित भारत के संविधान सभा के लिए हुये चुनाव में इसने खराब प्रदर्शन किया। 1948 में हू वर द शुद्राज़? की उत्तरकथा द अनटचेबलस: ए थीसिस ऑन द ओरिजन ऑफ अनटचेबिलिटी (अस्पृश्य: अस्पृश्यता के मूल पर एक शोध) मे अम्बेडकर ने हिंदू धर्म को लताड़ा।
संविधाननिर्माण
अपने विवादास्पद विचारों और गांधी व कांग्रेस की कटु आलोचना के बावजूद अम्बेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेत्ता की थी जिसके कारण जब, 15 अगस्त 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व मे आई तो उसने अम्बेडकर को देश का पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 29 अगस्त 1947 को, अम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना कि लिए बनी के संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। अम्बेडकर ने मसौदा तैयार करने के इस काम मे अपने सहयोगियों और समकालीन प्रेक्षकों की प्रशंसा अर्जित की। इस कार्य में अम्बेडकर का शुरुआती बौद्ध संघ रीतियों और अन्य बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन बहुत काम आया।
संघ रीति मे मतपत्र द्वारा मतदान, बहस के नियम, पूर्ववर्तिता और कार्यसूची के प्रयोग, समितियाँ और काम करने के लिए प्रस्ताव लाना शामिल है। संघ रीतियाँ स्वयं प्राचीन गणराज्यों जैसे शाक्य और लिच्छवि की शासन प्रणाली के निदर्श (मॉडल) पर आधारित थीं। अम्बेडकर ने हालांकि उनके संविधान को आकार देने के लिए पश्चिमी मॉडल इस्तेमाल किया है पर उसकी भावना भारतीय है। अम्बेडकर द्वारा तैयार किया गया संविधान पाठ मे संवैधानिक गारंटी के साथ व्यक्तिगत नागरिकों को एक व्यापक श्रेणी की नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा प्रदान की जिनमें, धार्मिक स्वतंत्रता, अस्पृश्यता का अंत और सभी प्रकार के भेदभावों को गैर कानूनी करार दिया गया। अम्बेडकर ने महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की वकालत की और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए सिविल सेवाओं, स्कूलों और कॉलेजों की नौकरियों मे आरक्षण प्रणाली शुरू के लिए सभा का समर्थन भी हासिल किया, भारत के विधि निर्माताओं ने इस सकारात्मक कार्यवाही के द्वारा दलित वर्गों के लिए सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के उन्मूलन और उन्हे हर क्षेत्र मे अवसर प्रदान कराने की चेष्टा की जबकि मूल कल्पना मे पहले इस कदम को अस्थायी रूप से और आवश्यकता के आधार पर शामिल करने की बात कही गयी थी। 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया। अपने काम को पूरा करने के बाद, बोलते हुए, अम्बेडकर ने कहा
मैं महसूस करता हूं कि संविधान, साध्य (काम करने लायक) है, यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मज़बूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके। वास्तव में, मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नही होगा कि हमारा संविधान खराब था बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अधम था।
1951 मे संसद में अपने हिन्दू कोड बिल के मसौदे को रोके जाने के बाद अम्बेडकर ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया इस मसौदे मे उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की मांग की गयी थी। हालांकि प्रधानमंत्री नेहरू, कैबिनेट और कई अन्य कांग्रेसी नेताओं ने इसका समर्थन किया पर संसद सदस्यों की एक बड़ी संख्या इसके खिलाफ़ थी। अम्बेडकर ने 1952 में लोक सभा का चुनाव एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मे लड़ा पर हार गये। मार्च 1952 मे उन्हें संसद के ऊपरी सदन यानि राज्य सभा के लिए नियुक्त किया गया और इसके बाद उनकी मृत्यु तक वो इस सदन के सदस्य रहे।
बौद्ध धर्म मे परिवर्तन
दीक्षा भूमि नागपुर  जहां अम्बेडकर अपने अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म मे परिवर्तित हुए।
सन् 1950 के दशक में अम्बेडकर बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और बौद्ध भिक्षुओं व विद्वानों के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका (तब सीलोन) गये। पुणे के पास एक नया बौद्ध विहार को समर्पित करते हुए, अम्बेडकर ने घोषणा की कि वे बौद्ध धर्म पर एक पुस्तक लिख रहे हैं और जैसे ही यह समाप्त होगी वो औपचारिक रूप से बौद्ध धर्म अपना लेंगे। 1954 में अम्बेडकर ने बर्मा का दो बार दौरा किया; दूसरी बार वो रंगून मे तीसरे विश्व बौद्ध फैलोशिप के सम्मेलन में भाग लेने के लिए गये। 1955 में उन्होने भारतीय बुद्ध महासभा या बौद्ध सोसाइटी ऑफ इंडिया की स्थापना की। उन्होंने अपने अंतिम लेख, द बुद्ध एंड हिज़ धम्म को 1956 में पूरा किया। यह उनकी मृत्यु के पश्चात प्रकाशित हुआ। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में अम्बेडकर ने खुद और उनके समर्थकों के लिए एक औपचारिक सार्वजनिक समारोह का आयोजन किया। अम्बेडकर ने एक बौद्ध भिक्षु से पारंपरिक तरीके से तीन रत्न ग्रहण और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इसके बाद उन्होने एक अनुमान के अनुसार लगभग 500000 समर्थको को बौद्ध धर्म मे परिवर्तित किया। नवयान लेकर अम्बेडकर और उनके समर्थकों ने हिंदू धर्म और हिंदू दर्शन की स्पष्ट निंदा की और उसे त्याग दिया। इसके बाद वे नेपाल में चौथे विश्व बौद्ध सम्मेलन मे भाग लेने के लिए काठमांडू गये। उन्होंने अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध या कार्ल मार्क्स को 2 दिसंबर 1956 को पूरा किया।
डॉ अम्बेडकर ने दीक्षा भूमि, नागपुर, भारत में ऐतिहासिक बौद्ध धर्मं में परिवर्तन के अवसर पर,14 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं. 800000 लोगों का बौद्ध धर्म में रूपांतरण ऐतिहासिक था क्योंकि यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक रूपांतरण था। उन्होंने इन शपथों को निर्धारित किया ताकि हिंदू धर्म के बंधनों को पूरी तरह पृथक किया जा सके ये 22 प्रतिज्ञाएँ हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं। ये एक सेतु के रूप में बौद्ध धर्मं की हिन्दू धर्म में व्याप्त भ्रम और विरोधाभासों से रक्षा करने में सहायक हो सकती हैं। इन प्रतिज्ञाओं से हिन्दू धर्म, जिसमें केवल हिंदुओं की ऊंची जातियों के संवर्धन के लिए मार्ग प्रशस्त किया गया, में व्याप्त अंधविश्वासों, व्यर्थ और अर्थहीन रस्मों, से धर्मान्तरित होते समय स्वतंत्र रहा जा सकता है।
मृत्यु महापरिनिर्वाण
अन्नाल अम्बेडकर मनिमंडपम 1948 से, अम्बेडकर मधुमेह से पीड़ित थे। जून से अक्टूबर 1954 तक वो बहुत बीमार रहे इस दौरान वो कमजोर होती दृष्टि से ग्रस्त थे। राजनीतिक मुद्दों से परेशान अम्बेडकर का स्वास्थ्य बद से बदतर होता चला गया और 1955 के दौरान किये गये लगातार काम ने उन्हें तोड़ कर रख दिया। अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध और उनके धम्म को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसम्बर 1956 को अम्बेडकर की मृत्यु नींद में दिल्ली में उनके घर मे हो गई। 7 दिसंबर को चौपाटी समुद्र तट पर बौद्ध शैली मे अंतिम संस्कार किया गया जिसमें सैकड़ों हजारों समर्थकों, कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों ने भाग लिया।
मृत्युपरांत अम्बेडकर के परिवार मे उनकी दूसरी पत्नी सविता अम्बेडकर रह गयी थीं जो, जन्म से ब्राह्मण थीं पर उनके साथ ही वो भी धर्म परिवर्तित कर बौद्ध बन गयी थीं। विवाह से पहले उनकी पत्नी का नाम शारदा कबीर था। सविता अम्बेडकर की एक बौद्ध के रूप में सन 2002 में मृत्यु हो गई, अम्बेडकर के पौत्र, प्रकाश यशवंत अम्बेडकर, भारिपा बहुजन महासंघ का नेतृत्व करते है और भारतीय संसद के दोनों सदनों मे के सदस्य रह चुके है। कई अधूरे टंकलिपित और हस्तलिखित मसौदे अम्बेडकर के नोट और पत्रों में पाए गए हैं। इनमें वैटिंग फ़ोर ए वीसा जो संभवतः 1935-36 के बीच का आत्मकथानात्मक काम है और अनटचेबल, ऑर द चिल्ड्रन ऑफ इंडियाज़ घेट्टो जो 1951 की जनगणना से संबंधित है। एक स्मारक अम्बेडकर के दिल्ली स्थित उनके घर 26 अलीपुर रोड में स्थापित किया गया है। अम्बेडकर जयंती पर सार्वजनिक अवकाश रखा जाता है। 1990 में उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया है। कई सार्वजनिक संस्थान का नाम उनके सम्मान में उनके नाम पर रखा गया है जैसे हैदराबाद, आंध्र प्रदेश का डॉ॰ अम्बेडकर मुक्त विश्वविद्यालय, बी आर अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय- मुजफ्फरपुर, डॉ॰ बाबासाहेब अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नागपुर में है, जो पहले सोनेगांव हवाई अड्डे के नाम से जाना जाता था। अम्बेडकर का एक बड़ा आधिकारिक चित्र भारतीय संसद भवन में प्रदर्शित किया गया है।
मुंबई मे उनके स्मारक हर साल लगभग पाँच लाख लोग उनकी वर्षगांठ (14 अप्रैल) पुण्यतिथि (6 दिसम्बर) और धम्म चक्र परिवर्तन् दिन 14 अक्टूबर नागपुर में, उन्हे अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इकट्ठे होते हैं। सैकड़ों पुस्तकालय स्थापित हो गये हैं और लाखों रुपए की पुस्तकें बेची जाती हैं। अपने अनुयायियों को उनका संदेश था !’
शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।
फिल्म
जब्बार पटेल ने सन 2000 मे डॉ॰ बाबा साहेब अम्बेडकर नामक हिन्दी फिल्म बनाई थी। इसमे अम्बेडकर की भूमिका माम्मूटी मे निभाई थी। भारत के राष्ट्रीय फ़िल्म विकास निगम और सामाजिक न्याय मंत्रालय के द्वारा प्रायोजित, यह फिल्म प्रदर्शन से पहले एक लंबी अवधि तक विवादो मे फँसी रही।
यू. सी. एल. ए. मे मानव शास्त्र के प्रोफेसर और ऐतिहासिक नृवंश विवरणकार, डॉ॰ डेविड ब्लुंडेल फिल्मों की एक श्रृंखला बनाने की दीर्घकालिक परियोजना बनाई है जो उन घटनाओं पर आधारित है जो भारत में समाज कल्याण की स्थिति के बारे में ज्ञान और इच्छा को प्रभावित करती है। ए राएज़िग लाइट डॉ॰ बी आर अम्बेडकर के जीवन और भारत में सामाजिक कल्याण की स्थिति पर आधारित थी ।

विदेश की धरा पर छा गया भीम पुत्र

खुडाला /फालना - डॉक्टर हिमांशु चौहान सुपुत्र श्री डॉक्टर  श्री किरण जी चौहान अपने सरगरा समाज के साथ दलित समाज का नाम रोशन कर मिसाल पेश की
 डॉक्टर हिमांशु ने मेडिकल कॉलेज केमरान रूस में छात्र संघ के अध्यक्ष पद का चुनाव जीतकर मनुवादियों की बोलती बंद कर दी
भीम वार्ता की तरफ से हिमांशु जी को हार्दिक बधाई तथा उज्जवल भविष्य की कामना के साथ जय भीम

JAY BHAIM जरुर पढ़ें

jay bhim welcome in bhimvarta

यदि आप भीम वार्ता में अपना लेख प्रकाशित करवाना चाहते हो या अपने क्षेत्र की न्यूज़ जो भीम से सम्बंधित हो उसे प्रकाशित करवानें तथा अपने किसी अम्बेडकरवादी संगठन के नाम को भीम वार्ता में प्रकाशित करवानें के लिए नीचे दिया गया फॉर्म भरें